Wednesday, August 6, 2008

बाल कथा - बैंगन का भरता


चिंटू ने लंबी डकार ली और खुश हो कर मम्मी से बोला आज आपने बैंगन का भरता बहुत स्वादिष्ट बनाया था। वह लगभग कूदता हुआ अपने डायनिंग टेबल से उतरा।

गिर पड़ोगे...जब तक मम्मी उसे डाँट पाती वह लड़खड़ा कर गिर पड़ा। उसका हाथ पास ही रखी सब्जी की टोकरी पर इस तरह पड़ा कि व नींचे और सारी सब्जियाँ ऊपर।

मटर के दाने खिलखिला कर हँस पड़े। कद्दू दादा अपनी हँसी रोक कर बोले “...यह शैतान करेला है, उसपर नीम चढ़ा। करेला बरबटी की सेज पर सोया पड़ा था तुनक कर उठ गया। एक तो कद्दू दादा, आपको कोई खाना पसंद नहीं करता उसपर आप हमेशा मेरा मजाक उड़ाते रहते है। आपको पता है मुझे खाने से बच्चों खा खून बढ‌़ता है। चिंटू को चपत पड‌़ गयी थी, इस से सबसे ज्यादा दुख बैंगन को हुआ था। कितना प्यारा बच्चा है चिंटू, उसपर मुझे कितने चाव से खाता है। मैं हूँ ही इतना लजीज़ कि कोई भी खाये तो मस्त हो जाये। चिंटू की मम्मी भी बात बात पर मारने लगती हैं, यह कोई अच्छी बात नहीं है।

सब्जी की डलिया में आज हलचल थी। किसी को चिंटू से सहानुभूति थी तो कोई चिंटू की मम्मी की तरफ से बोल रहा था। बच्चों को अपने नियंत्रण में रखना भी आवश्यक हैभिंडी चाची बोली। शैतान बच्चे अच्छे तो होते हैं लेकिन हमेशा शैतानी अच्छी नहीं होती। सच कह रही हो बहनटमाटर बोल पड़ा कितनी बार चिंटू की इन्ही हरकतों के कारण मेरी बिना बात चटनी बन गयी है। कभी मुझपर बैठ जाता है कभी वह मुझे गेंद समझता है। उसके कमरे की दीवार पर जितने दाग हैं न उसमें मेरी चटनी भी है....

सभी की बातों से दूर बैंगन बहुत खुश था। रह रह कर अपने आप को निहारता। बैंगनी रंग, गोल मटोल सुन्दर सलोना रूप और सबसे बड़ी बात कि सर पर ताज भी...कितनी सब्जियों के पास है इतना कुछ।

क्या बात है? क्या सोच रहे होमिर्च ने बैंगन की सोच में खलल डाला।

आज चिंटू भरता खा कर कितना खुश हुआ था..मेरा स्वाद है ही एसाबैंगन नें इतरा कर कहा।

छो़ड़ो भीमिर्ची बोली। तुम्हे पता है अगर मैं न रहूँ तो तुम्हें को कोई पूछे भी न, हर सब्जी के स्वाद का कारण मेरा तीखापन है

झूठी कहीं कीबैंगन को गुस्सा आ गया। याद नहीं है कल कैसे चिंटू ने सारा खाना छोड़ दिया था और मिर्च-मिर्च चिल्लाता हुआ दो घंटे तक पानी पीता रहा था

हर चीज सीमा में अच्छी होती है, गलती मेरी नहीं, चिंटू की मम्मी की थी। उनहोने सब्जी में मुझे बहुत सारा मिला दिया, यह तो होना ही थामिर्ची नें अपनी सफाई दी।

अरे जाओ, नाच न जाने आँगन टेढा, तुम्हें पूछता कौन है....तुम्हे जबरदस्ती मिलाया जाता है खाने में, वर्ना अपनी पौध में टंगी टंगी ही सड़ जाओबैंगन की बात से घमंड टपक रहा था। और घमंड करना अच्छी बात नहीं होती। मिर्ची को भी हमेशा यही लगता था कि बाकी सब्जियों की तारीफ उसके कारण ही होती है। खाने में अगर वह न हो तो कोई स्वाद नहीं। उस रोज बात बढ़ते-बढ़ते बतंगड़ बन गयी। सब्जियों के दो गुट हो गये और इतना झगड़ा बढ़ा कि बात चिंटू की मम्मी तक पहुँच गयी।

चिंटू की मम्मी दो घंटे से इस बहस को सुन रही थीं। उन्हे लगा कि यह अच्छा समय है सभी को इस बात का अहसास कराने का कि कौन कितने पानी में है। उन्होंने बैंगन और मिर्च से अलग-अलग बात की फिर तय हुआ कि दो भरते बनाये जायेंगे एक बैंगन का भरता लेकिन उसमें मिर्च बिलकुल नहीं होगी और दूसरा मिर्च का भरता।


मेरा भी भरता बन सकता हैमिर्च बहुत उत्साहित हुई। उसने आँखे तरेर कर बैंगन को देखा जैसे कह रही हो आज फैसला हो ही जायेगा।


रात हुई। खाने की मेज पर सबको चिंटू का इंतजार था। सारी सब्जियों के कान खाने की टेबल पर लगे थे। चिंटू कूदता हुआ आया और चिल्लाते हुए बोला मम्मी भूख लगी है जल्दी से खाना लगाओ। मम्मी नें खाना परोसा। मनपसंद बैंगन का भरता देख कर उसके मुंह में पानी आ गया। साथ ही साथ हरे रंग का एक और भरता था।

यह क्या बना है मम्मीचिंटू नें पूछा।


यह मिर्च का भरता है बेटामम्मी नें बताया। भरता चिंटू को बहुत पसंद था, उसे लगा कि यह तो सोने पर सुहागा है। एक साथ दो दो भरते...उसने बैंगन के भरते से शुरुआत की। एक चम्मच खाते ही वह थू-थू करने लगा। मिर्च इस पर हँस पड़ी। अब बारी मिर्च के भरते की थी...जीभ से लगते ही चिंटू जैसे नाँचने लगा। पानी-पानी चिल्लाते हुए वह मम्मी के पास पहुँचा। तेज मिर्च लगने के कारण उसकी आँख से पानी आ रहा था। मम्मी ने जल्दी से उसे चीनी खाने को दी। चीनी खाते ही चिंटू को शांति मिली।

मम्मी यह कैसा भरता है, एक में कोई स्वाद नहीं तो दूसरा इतना तीखाचिंटू ने शिकायत के लहजे में कहा। अब मम्मी सब्जियों की तरफ देख कर हँस पडी। बोलीं मिलजुल कर चलने से ही सारे काम बनते हैं, एक दूसरे का साथ ही किसी कार्य को सफल बनाता है


मम्मी ने तब चिंटू को बैंगन और मिर्ची के झगड़े की पूरी कहानी सुनायी। चिंटू ने फिर सब्जी की डलिया की ओर देखा। बैंगन और मिर्ची दोनों की नजरें झुकी हुई थीं। एक दूसरे के साथ चलने का महत्व मिर्ची, बैंगन और चिंटू तीनों को समझ आ गया था।...। मम्मी ने फिर बैंगन का भरता चिंटू को परोसा, इस भरते का लाजवाब स्वाद बता रहा था कि मिलजुल कर रहने में कितना आनंद है।


*** राजीव रंजन प्रसाद

5 comments:

Rajesh Roshan said...

बहुत ही बढ़िया कहानी... राजीव जी आपने कुहू के बारे में कुछ नही बताया

शोभा said...

कुहू बिटिया
कहानी सुनाने के लिए आभार।
सच में मिलजुल कर रहने में बहुत मज़ा है। सस्नेह

सुनीता शानू said...

बहुत अच्छी कहानी है,और हमारी प्यारी बेटी कुहू कैसी है?

Udan Tashtari said...

पुनः एक सुन्दर सीख देती कहानी, बधाई इस उम्दा रचना के लिए. इसे जारी रखें.शुभकामनाऐँ.

Mumukshh Ki Rachanain said...

राजीव जी,
कितनी खूबसूरती से आप बच्चों को मिल- जुल कर रहने से होने वाले फायदे को बता गए, काश कल के बच्चे , जो आज नेता बन चुकें हैं भी गंदी राजनीति छोड़ कर मिलजुल कर देशहित, जनहित में स्वार्थ से परे हटकर मिलजुल कर ठोस कार्य कर मिसाल पैदा करते तो उनके कर्मों से देश के बच्चों को भी ये शिक्षा मिलती ही ....
“मिलजुल कर चलने से ही सारे काम बनते हैं, एक दूसरे का साथ ही किसी कार्य को सफल बनाता है”।
और शायद फिर बैगन या मिर्ची का भरता बनवा कर बच्चों को न समझाना पड़ता .

चन्द्र मोहन गुप्त